श्री दुर्गा चालीसा — जगज्जननी भगवती आद्यशक्ति की स्तुति व विधि
मातेश्वरी नवदुर्गा की नित्य आराधना हेतु रचित परम कल्याणकारी चालीसा पाठ, जो भय और दारिद्र्य को दूर करता है।
डॉ. विनोद पण्डेय
मातेश्वरी नवदुर्गा की नित्य आराधना हेतु रचित परम कल्याणकारी चालीसा पाठ, जो भय और दारिद्र्य को दूर करता है।

इस लेख में दिए गए उपाय, टोटके, मंत्र व स्तोत्र सार्वभौमिक वैदिक सिद्धांतों पर आधारित हैं। इनका सटीक परिणाम आपकी जन्म कुंडली, ग्रह स्थिति, महादशा व गोचर पर निर्भर करता है। अतः किसी भी उपाय या साधना को व्यक्तिगत रूप से करने से पहले ज्योतिषी से परामर्श अवश्य लें।
श्री दुर्गा चालीसा
स्रोत एवं संदर्भ: देवी भागवत एवं मार्कण्डेय पुराण की परंपरानुसार मां दुर्गा की स्तुति।
॥ दोहा ॥
नमो नमो दुर्गे सुख करनी ।
नमो नमो अम्बे दुःख हरनी ॥
निरंकार है ज्योति तुम्हारी ।
तिहूँ लोक फैली उजियारी ॥
॥ चौपाई ॥
शशि ललाट मुख महाविशाला ।
नेत्र लाल भृकुटि विकराला ॥ १ ॥
रूप मातु को अधिक सुहावे ।
दरश करत जन अति सुख पावे ॥ २ ॥
तुम संसार शक्ति लय कीना ।
पालन हेतु अन्न धन दीना ॥ ३ ॥
अन्नपूर्णा हुई जग पाला ।
तुम ही आदि सुन्दरी बाला ॥ ४ ॥
प्रलयकाल सब नाशनहारी ।
तुम गौरी शिवशंकर प्यारी ॥ ५ ॥
शिव योगी तुम्हरे गुण गावें ।
ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें ॥ ६ ॥
रूप सरस्वती को तुम धारा ।
दे सुबुद्धि ऋषि मुनिन उबारा ॥ ७ ॥
धरयो रूप नरसिंह को अम्बा ।
परगट भई फाड़कर खम्बा ॥ ८ ॥
रक्षा करि प्रह्लाद बचायो ।
हिरणाकुश को स्वर्ग पठायो ॥ ९ ॥
लक्ष्मी रूप धरो जग माहीं ।
श्री नारायण अंग समाहीं ॥ १० ॥
क्षीरसिन्धु में करत विलासा ।
दयासिन्धु दीजै मन आसा ॥ ११ ॥
हिंगलाज में तुम्हीं भवानी ।
महिमा अमित न जात बखानी ॥ १२ ॥
मातंगी धूमावति माता ।
भुवनेश्वरी बगला सुखदाता ॥ १३ ॥
श्री भैरव तारा जग तारिणी ।
छिन्न भाल भव दुःख निवारिणी ॥ १४ ॥
केहरि वाहन सोह भवानी ।
लांगुर वीर चलत अगवानी ॥ १५ ॥
कर में खप्पर खड्ग विराजै ।
जाको देख काल डर भाजै ॥ १६ ॥
सोहै अस्त्र और त्रिशूला ।
जाते उठत शत्रु हिय शूला ॥ १७ ॥
नगरकोट में तुम्हीं विराजत ।
तिहुँलोक में डंका बाजत ॥ १८ ॥
महिषासुर नृप अति अभिमानी ।
जेहि अघ भार मही अकुलानी ॥ १९ ॥
रूप कराल कालिका धारा ।
सेन सहित तुम तिहि संहारा ॥ २० ॥
दुर्गे दया करो मोरि माई ।
तुम बिनु कोउ न होत सहाई ॥ २१ ॥
यह चालीसा जो नित गावै ।
सब सुख भोगि परमपद पावै ॥ २२ ॥
॥ दोहा ॥
शरणागत की लाज रखु मात भवानी आन ।
संकट सब हर लीजिये दीजै पद कल्यान ॥
॥ इति श्रीदुर्गाचालीसा सम्पूर्णा ॥
॥ जप / पाठ समर्पण मन्त्रः ॥
गुह्यातिगुह्यगोप्त्री त्वं गृहाणास्मत्कृतं जपम् ।
सिद्धिर्भवतु मे देवि त्वत्प्रसादान्महेश्वरि ॥
॥ ॐ तत्सत् श्रीजगदम्बाचरणारविन्दार्पणमस्तु ॥
इस पाठ एवं उपाय से प्राप्त होने वाले व्यावहारिक लाभ
ऋषि-मुनियों द्वारा प्रतिपादित इस अनुष्ठान का नियमित अभ्यास करने से जातक को निम्नलिखित प्रत्यक्ष सकारात्मक परिणामों की अनुभूति होती है:
मानसिक शांति व एकाग्रता
दैनिक चिंता, अज्ञात भय, अनिद्रा व नकारात्मक विचारों का शमन होकर आत्मविश्वास में वृद्धि होती है।
संकट व विघ्न निवारण
लंबे समय से अटके हुए कार्य, कानूनी अड़चनों व व्यावसायिक रुकावटों में दैवीय मार्ग प्रशस्त होता है।
आर्थिक स्थिरता व ऋण मुक्ति
मां महालक्ष्मी व कुबेर देव की कृपा से अनावश्यक धन अपव्यय रुकता है और आय के नए स्रोत बनते हैं।
ग्रह दोष शमन व भाग्योदय
कुंडली के क्रूर ग्रहों (शनि, राहु, मंगल) के अशुभ गोचर का प्रभाव शांत होकर शुभ फलों में वृद्धि होती है।
पाठ एवं पूजन की सरल प्रामाणिक विधि
किसी भी स्तोत्र या उपाय की पूर्ण सिद्धि के लिए सही विधि व नियमों का पालन करना अत्यंत आवश्यक है:
शुद्धि व पवित्रता (Purity & Preparation)
प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ श्वेत अथवा पीले वस्त्र धारण करें। चित्त को शांत और एकाग्र रखें।
दिशा व आसन (Direction & Seating)
पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। बैठने के लिए कुशा अथवा ऊनी आसन का प्रयोग करें।
दीप प्रज्वलन व आचमन (Lamp & Holy Water)
गाय के शुद्ध घी अथवा तिल के तेल का दीपक प्रज्वलित करें और तांबे के पात्र में स्वच्छ जल रखें।
संकल्प व पाठ (Sankalpa & Mindful Recitation)
हाथ में अक्षत व जल लेकर अपनी मनोकामना का स्मरण करें और स्पष्ट स्वर में लयबद्ध पाठ करें।
समर्पण व क्षमा याचना (Surrender & Gratitude)
पाठ के समापन पर भगवान को प्रणाम करें और अनजाने में हुई किसी त्रुटि के लिए क्षमा मांगें।
क्या आप अपनी कुंडली अनुसार संकल्प व समय जानना चाहते हैं?
आपकी लग्न राशि व वर्तमान महादशा के अनुसार यह पाठ कितने दिनों तक और किस माला से करना चाहिए, ज्योतिषी से सीधे 1-on-1 चैट पर पूछें।
इस पाठ एवं उपाय से संबंधित सामान्य जिज्ञासाएं
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