संकटनाशन गणेश स्तोत्रम् — विघ्न विनाशक पावन पाठ व विधि
नारद पुराणोक्त द्वादश नाम संकटनाशन गणेश स्तोत्रम् जीवन के समस्त विघ्नों, ऋण और संकटों को समूल नष्ट करने वाला परम सिद्ध स्तोत्र है।
डॉ. विनोद पण्डेय
नारद पुराणोक्त द्वादश नाम संकटनाशन गणेश स्तोत्रम् जीवन के समस्त विघ्नों, ऋण और संकटों को समूल नष्ट करने वाला परम सिद्ध स्तोत्र है।

इस लेख में दिए गए उपाय, टोटके, मंत्र व स्तोत्र सार्वभौमिक वैदिक सिद्धांतों पर आधारित हैं। इनका सटीक परिणाम आपकी जन्म कुंडली, ग्रह स्थिति, महादशा व गोचर पर निर्भर करता है। अतः किसी भी उपाय या साधना को व्यक्तिगत रूप से करने से पहले ज्योतिषी से परामर्श अवश्य लें।
संकटनाशन गणेश स्तोत्रम्
स्रोत एवं पौराणिक संदर्भ: यह परम पावन स्तोत्र श्रीनारद पुराण के पूर्वभाग से उद्धृत है। देवर्षि नारद ने समस्त मानव जाति के कल्याण और संकट निवारण हेतु विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश के बारह कल्याणकारी नामों का यह स्तोत्र प्रकट किया था।
॥ विनियोगः ॥
ॐ अस्य श्रीसंकटनाशनगणेशस्तोत्रमन्त्रस्य नारद ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, संकटनाशनगणपतिर्देवता, सर्वसंकटविनाशार्थे जपे (पाठे) विनियोगः ॥
॥ मूल संस्कृत स्तोत्रम् ॥
नारद उवाच —
प्रणम्य शिरसा देवं गौरीपुत्रं विनायकम् ।
भक्तावासं स्मरेन्नित्यमायुःकामार्थसिद्धये ॥ १ ॥
प्रथमं वक्रतुण्डं च एकदन्तं द्वितीयकम् ।
तृतीयं कृष्णपिङ्गाक्षं गजवक्त्रं चतुर्थकम् ॥ २ ॥
लम्बोदरं पञ्चमं च षष्ठं विकटमेव च ।
सप्तमं विघ्नराजेन्द्रं धूम्रवर्णं तथाष्टमम् ॥ ३ ॥
नवमं भालचन्द्रं च दशमं तु विनायकम् ।
एकादशं गणपतिं द्वादशं तु गजाननम् ॥ ४ ॥
द्वादशैतानि नामानि त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः ।
न च विघ्नभयं तस्य सर्वसिद्धिकरं प्रभो ॥ ५ ॥
विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी लभते धनम् ।
पुत्रार्थी लभते पुत्रान् मोक्षार्थी लभते गतिम् ॥ ६ ॥
जपेद्गणपतिस्तोत्रं षड्भिर्मासैः फलं लभेत् ।
संवत्सरेण सिद्धिं च लभते नात्र संशयः ॥ ७ ॥
अष्टभ्यो ब्राह्मणेभ्यश्च लिखित्वा यः समर्पयेत् ।
तस्य विद्या भवेत्सर्वा गणेशस्य प्रसादतः ॥ ८ ॥
॥ इति श्रीनारदपुराणे सङ्कटनाशनं नाम श्रीगणेशस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
॥ जप / पाठ समर्पण मन्त्रः ॥
गुह्यातिगुह्यगोप्ता त्वं गृहाणास्मत्कृतं जपम् ।
सिद्धिर्भवतु मे देव त्वत्प्रसादाद् गणाधिप ॥
कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा बुद्ध्यात्मना वा प्रकृतेः स्वभावात् ।
करोमि यद्यत् सकलं परस्मै नारायणायेति समर्पयामि ॥
॥ ॐ तत्सत् श्रीगणेशार्पणमस्तु ॥
॥ पाठभेद एवं पाठांतर टिप्पणी ॥
वैदिक व पौराणिक पांडुलिपियों (यथा बृहत्स्तोत्ररत्नाकर एवं नारद पुराण की विभिन्न शाखाओं) में निम्नलिखित प्रामाणिक पाठभेद प्राप्त होते हैं:
1. श्लोक ५ में: मुख्य पाठ 'सर्वसिद्धिकरं प्रभो' के स्थान पर कुछ प्रतियों में 'सर्वसिद्धिकरं परम्' अथवा 'सर्वकामार्थसाधकम्' प्राप्त होता है।
2. श्लोक ६ में: 'मोक्षार्थी लभते गतिम्' के स्थान पर कई प्रामाणिक संस्करणों में 'मोक्षार्थी लभते पदम्' का पाठ मिलता है। दोनों ही पाठ अर्थ की दृष्टि से मोक्ष और सद्गति को ही निरूपित करते हैं।
॥ पाठ विधि एवं नियम ॥
1. दिशा व आसन: प्रातःकाल स्नानादि से निवृत्त होकर पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख करके लाल अथवा पीले ऊनी आसन पर बैठें।
2. दीप व अर्घ्य: श्री गणेश जी की प्रतिमा या चित्र के समक्ष शुद्ध देशी घी का दीपक प्रज्वलित करें। तांबे के पात्र में जल, अक्षत व रोली रखकर अर्घ्य दें।
3. प्रिय भोग व दूर्वा: बप्पा को २१ दूर्वा दल (जोड़े में) तथा मोदक अथवा बेसन के लड्डू का भोग लगाएं।
4. पाठ संख्या: नित्य प्रातः ३ पाठ अथवा संकट निवारण हेतु त्रिकाल (प्रातः, मध्याह्न व संध्या) १-१ पाठ करना चाहिए।
5. ज्योतिषीय प्रभाव: यह पाठ जन्मकुंडली में बुध ग्रह की दुर्बलता, केतु जनित मानसिक भय तथा राहु के विघ्नकारी योगों को पूर्णतया शांत करता है।
इस पाठ एवं उपाय से प्राप्त होने वाले व्यावहारिक लाभ
ऋषि-मुनियों द्वारा प्रतिपादित इस अनुष्ठान का नियमित अभ्यास करने से जातक को निम्नलिखित प्रत्यक्ष सकारात्मक परिणामों की अनुभूति होती है:
मानसिक शांति व एकाग्रता
दैनिक चिंता, अज्ञात भय, अनिद्रा व नकारात्मक विचारों का शमन होकर आत्मविश्वास में वृद्धि होती है।
संकट व विघ्न निवारण
लंबे समय से अटके हुए कार्य, कानूनी अड़चनों व व्यावसायिक रुकावटों में दैवीय मार्ग प्रशस्त होता है।
आर्थिक स्थिरता व ऋण मुक्ति
मां महालक्ष्मी व कुबेर देव की कृपा से अनावश्यक धन अपव्यय रुकता है और आय के नए स्रोत बनते हैं।
ग्रह दोष शमन व भाग्योदय
कुंडली के क्रूर ग्रहों (शनि, राहु, मंगल) के अशुभ गोचर का प्रभाव शांत होकर शुभ फलों में वृद्धि होती है।
पाठ एवं पूजन की सरल प्रामाणिक विधि
किसी भी स्तोत्र या उपाय की पूर्ण सिद्धि के लिए सही विधि व नियमों का पालन करना अत्यंत आवश्यक है:
शुद्धि व पवित्रता (Purity & Preparation)
प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ श्वेत अथवा पीले वस्त्र धारण करें। चित्त को शांत और एकाग्र रखें।
दिशा व आसन (Direction & Seating)
पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। बैठने के लिए कुशा अथवा ऊनी आसन का प्रयोग करें।
दीप प्रज्वलन व आचमन (Lamp & Holy Water)
गाय के शुद्ध घी अथवा तिल के तेल का दीपक प्रज्वलित करें और तांबे के पात्र में स्वच्छ जल रखें।
संकल्प व पाठ (Sankalpa & Mindful Recitation)
हाथ में अक्षत व जल लेकर अपनी मनोकामना का स्मरण करें और स्पष्ट स्वर में लयबद्ध पाठ करें।
समर्पण व क्षमा याचना (Surrender & Gratitude)
पाठ के समापन पर भगवान को प्रणाम करें और अनजाने में हुई किसी त्रुटि के लिए क्षमा मांगें।
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