श्री चन्द्र कवचम् — पद्म पुराणोक्त अमृतमयी रक्षा कवच
पद्म पुराणोक्त चन्द्र कवच मानसिक तनाव, अनिद्रा, अवसाद और कमजोर चंद्रमा जनित रोग-शोक को शांत कर मन को शांति प्रदान करता है।
डॉ. विनोद पण्डेय
पद्म पुराणोक्त चन्द्र कवच मानसिक तनाव, अनिद्रा, अवसाद और कमजोर चंद्रमा जनित रोग-शोक को शांत कर मन को शांति प्रदान करता है।

इस लेख में दिए गए उपाय, टोटके, मंत्र व स्तोत्र सार्वभौमिक वैदिक सिद्धांतों पर आधारित हैं। इनका सटीक परिणाम आपकी जन्म कुंडली, ग्रह स्थिति, महादशा व गोचर पर निर्भर करता है। अतः किसी भी उपाय या साधना को व्यक्तिगत रूप से करने से पहले ज्योतिषी से परामर्श अवश्य लें।
श्री चन्द्र कवचम्
स्रोत एवं पौराणिक संदर्भ: यह पावन कवच पद्म पुराण के स्वर्गखण्ड से उद्धृत है। महर्षि गौतम ने चंद्र देव के सौम्य और अमृतमयी रूप की रक्षा हेतु यह मन्त्र प्रकट किया था।
॥ विनियोगः ॥
ॐ अस्य श्रीचन्द्रकवचस्तोत्रमन्त्रस्य गौतम ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीचन्द्रो देवता, श्रीचन्द्रप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः ॥
॥ मूल संस्कृत कवचम् ॥
शशिनः पातु मे मूर्धानं ललाटं पातु चन्द्रमाः ।
नेत्रे पातु निशानाथः श्रोत्रे पातु कलानिधिः ॥ १ ॥
घ्राणं पातु सुधाकरश्च मुखं पातु हिमांशुमान् ।
जिह्वां रोहिणीपतिः पातु कण्ठं पातु मृगाङ्कभृत् ॥ २ ॥
करौ मे पातु शीतांशुः स्तनौ पातु द्विजप्रियः ।
हृदयं पातु मे सोमः नाभिं पातु मनःप्रियः ॥ ३ ॥
कटिं मे पातु ताराधिप ऊरू पातु कलाधरः ।
जानुनी पातु शीतरोचिर्जङ्घे पातु तमिस्रहा ॥ ४ ॥
पादौ मे पातु सर्वात्मा पातु सर्वं वपुः सदा ।
एतद्धि कवचं पुण्यं चन्द्रस्य परमाद्भुतम् ॥ ५ ॥
यः पठेच्छृणुयाद्वापि सर्वपापैः प्रमुच्यते ।
सर्वान् कामानवाप्नोति चन्द्रलोकं स गच्छति ॥ ६ ॥
॥ इति श्रीपद्मपुराणे गौतमऋषिप्रोक्तं श्रीचन्द्रकवचं सम्पूर्णम् ॥
॥ जप / पाठ समर्पण मन्त्रः ॥
गुह्यातिगुह्यगोप्ता त्वं गृहाणास्मत्कृतं जपम् ।
सिद्धिर्भवतु मे देव त्वत्प्रसादान्निशाकर ॥
॥ ॐ तत्सत् श्रीसोमदेवचरणार्पणमस्तु ॥
॥ पाठ विधि एवं ज्योतिषीय फल ॥
1. सोमवार का दिन: सोमवार की संध्या अथवा पूर्णिमा की रात्रि श्वेत वस्त्र धारण कर उत्तर दिशा की ओर मुख करें।
2. अर्चना: शिवजी पर कच्चा दूध व जल चढ़ाकर चन्द्र देव के इस कवच का ३ या ११ बार पाठ करें।
3. ज्योतिषीय प्रभाव: चंद्रमा की दुर्बलता, कुंडली में विष योग, केमद्रुम योग अथवा माता के स्वास्थ्य की रक्षा हेतु यह सर्वोत्तम उपाय है।
इस पाठ एवं उपाय से प्राप्त होने वाले व्यावहारिक लाभ
ऋषि-मुनियों द्वारा प्रतिपादित इस अनुष्ठान का नियमित अभ्यास करने से जातक को निम्नलिखित प्रत्यक्ष सकारात्मक परिणामों की अनुभूति होती है:
मानसिक शांति व एकाग्रता
दैनिक चिंता, अज्ञात भय, अनिद्रा व नकारात्मक विचारों का शमन होकर आत्मविश्वास में वृद्धि होती है।
संकट व विघ्न निवारण
लंबे समय से अटके हुए कार्य, कानूनी अड़चनों व व्यावसायिक रुकावटों में दैवीय मार्ग प्रशस्त होता है।
आर्थिक स्थिरता व ऋण मुक्ति
मां महालक्ष्मी व कुबेर देव की कृपा से अनावश्यक धन अपव्यय रुकता है और आय के नए स्रोत बनते हैं।
ग्रह दोष शमन व भाग्योदय
कुंडली के क्रूर ग्रहों (शनि, राहु, मंगल) के अशुभ गोचर का प्रभाव शांत होकर शुभ फलों में वृद्धि होती है।
पाठ एवं पूजन की सरल प्रामाणिक विधि
किसी भी स्तोत्र या उपाय की पूर्ण सिद्धि के लिए सही विधि व नियमों का पालन करना अत्यंत आवश्यक है:
शुद्धि व पवित्रता (Purity & Preparation)
प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ श्वेत अथवा पीले वस्त्र धारण करें। चित्त को शांत और एकाग्र रखें।
दिशा व आसन (Direction & Seating)
पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। बैठने के लिए कुशा अथवा ऊनी आसन का प्रयोग करें।
दीप प्रज्वलन व आचमन (Lamp & Holy Water)
गाय के शुद्ध घी अथवा तिल के तेल का दीपक प्रज्वलित करें और तांबे के पात्र में स्वच्छ जल रखें।
संकल्प व पाठ (Sankalpa & Mindful Recitation)
हाथ में अक्षत व जल लेकर अपनी मनोकामना का स्मरण करें और स्पष्ट स्वर में लयबद्ध पाठ करें।
समर्पण व क्षमा याचना (Surrender & Gratitude)
पाठ के समापन पर भगवान को प्रणाम करें और अनजाने में हुई किसी त्रुटि के लिए क्षमा मांगें।
क्या आप अपनी कुंडली अनुसार संकल्प व समय जानना चाहते हैं?
आपकी लग्न राशि व वर्तमान महादशा के अनुसार यह पाठ कितने दिनों तक और किस माला से करना चाहिए, ज्योतिषी से सीधे 1-on-1 चैट पर पूछें।
इस पाठ एवं उपाय से संबंधित सामान्य जिज्ञासाएं
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