श्री सूर्य कवचम् — त्रैलोक्यमंगल ब्रह्मोक्त कवच व विधि
भगवान् सूर्य देव का यह त्रैलोक्यमंगल कवच नेत्र रोग, हृदय विकार, अपयश और सूर्य जनित समस्त अरिष्टों का समूल नाश करता है।
डॉ. विनोद पण्डेय
भगवान् सूर्य देव का यह त्रैलोक्यमंगल कवच नेत्र रोग, हृदय विकार, अपयश और सूर्य जनित समस्त अरिष्टों का समूल नाश करता है।

इस लेख में दिए गए उपाय, टोटके, मंत्र व स्तोत्र सार्वभौमिक वैदिक सिद्धांतों पर आधारित हैं। इनका सटीक परिणाम आपकी जन्म कुंडली, ग्रह स्थिति, महादशा व गोचर पर निर्भर करता है। अतः किसी भी उपाय या साधना को व्यक्तिगत रूप से करने से पहले ज्योतिषी से परामर्श अवश्य लें।
श्री सूर्य कवचम् (त्रैलोक्यमंगल)
स्रोत एवं पौराणिक संदर्भ: यह दिव्य कवच ब्रह्मवैवर्त पुराण एवं याज्ञवल्क्य स्मृति में वर्णित है। जगत्पिता ब्रह्माजी ने समस्त लोकों की रक्षा हेतु भगवान् भुवनभास्कर सूर्य देव का यह कवच प्रकट किया था।
॥ विनियोगः ॥
ॐ अस्य श्रीसूर्यत्रैलोक्यमङ्गलाख्यकवचस्य ब्रह्मा ऋषिः, गायत्री छन्दः, श्रीसूर्यो देवता, श्रीसूर्यप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः ॥
॥ मूल संस्कृत कवचम् ॥
शिरो मे भास्करः पातु ललाटे मेऽमिताद्युतिः ।
नेत्रे दिनमणिः पातु श्रवणे वासरेश्वरः ॥ १ ॥
घ्राणं धर्मघृणिः पातु वदनं वेदवन्दितः ।
जिह्वां मे मानदः पातु कण्ठं मे पातु भानुमान् ॥ २ ॥
स्कन्धौ संवर्धकः पातु भुजौ मे सौम्यविक्रमः ।
हस्तौ मे विप्रहस्तश्च हृदयं पातु भानुमान् ॥ ३ ॥
मध्यं पातु जगद्धाता नाभिं पातु रविः सदा ।
कटिं पातु प्रभाकरश्च ऊरू पातु जनप्रियः ॥ ४ ॥
जानुनी पातु मार्तण्डो जङ्घे पातु दिवाकरः ।
पादौ मे सविता पातु पातु सर्वं वपुर्मम ॥ ५ ॥
प्राच्यां रक्षतु मामर्क आग्नेय्यां पातु भास्करः ।
दक्षिणे मे रविः पातु नैऋत्यां दिननायकः ॥ ६ ॥
प्रतीच्यां पातु मां भानुर्वायव्यां चण्डदीधितिः ।
उदीच्यां पातु मे सूर्य ऐशान्यां खचरो विभुः ॥ ७ ॥
ऊर्ध्वं पातु सहस्रांशुः अधस्तात् पातु तिग्मरुक् ।
सर्वतः सर्वदा पातु भगवान् लोकलोचनः ॥ ८ ॥
॥ इति श्रीब्रह्मोक्तं श्रीसूर्यत्रैलोक्यमङ्गलं कवचं सम्पूर्णम् ॥
॥ जप / पाठ समर्पण मन्त्रः ॥
गुह्यातिगुह्यगोप्ता त्वं गृहाणास्मत्कृतं जपम् ।
सिद्धिर्भवतु मे देव त्वत्प्रसादाद् दिवाकर ॥
॥ ॐ तत्सत् श्रीसूर्यनारायणार्पणमस्तु ॥
॥ पाठ विधि एवं ज्योतिषीय फल ॥
1. रविवार का दिन: रविवार के दिन प्रातःकाल सूर्योदय के समय तांबे के लोटे में जल, लाल चन्दन, गुड़ और लाल पुष्प डालकर सूर्य देव को अर्घ्य दें।
2. पाठ विधान: अर्घ्य देने के पश्चात पूर्व दिशा की ओर मुख करके लाल आसन पर बैठकर ३ पाठ करें।
3. ज्योतिषीय फल: जन्मकुंडली में सूर्य के नीच राशि (तुला), ग्रहण योग, या राहु-केतु से पीड़ित होने पर, पिता से अनबन या सरकारी कार्यों में बाधा आने पर यह कवच अचूक फल प्रदान करता है।
इस पाठ एवं उपाय से प्राप्त होने वाले व्यावहारिक लाभ
ऋषि-मुनियों द्वारा प्रतिपादित इस अनुष्ठान का नियमित अभ्यास करने से जातक को निम्नलिखित प्रत्यक्ष सकारात्मक परिणामों की अनुभूति होती है:
मानसिक शांति व एकाग्रता
दैनिक चिंता, अज्ञात भय, अनिद्रा व नकारात्मक विचारों का शमन होकर आत्मविश्वास में वृद्धि होती है।
संकट व विघ्न निवारण
लंबे समय से अटके हुए कार्य, कानूनी अड़चनों व व्यावसायिक रुकावटों में दैवीय मार्ग प्रशस्त होता है।
आर्थिक स्थिरता व ऋण मुक्ति
मां महालक्ष्मी व कुबेर देव की कृपा से अनावश्यक धन अपव्यय रुकता है और आय के नए स्रोत बनते हैं।
ग्रह दोष शमन व भाग्योदय
कुंडली के क्रूर ग्रहों (शनि, राहु, मंगल) के अशुभ गोचर का प्रभाव शांत होकर शुभ फलों में वृद्धि होती है।
पाठ एवं पूजन की सरल प्रामाणिक विधि
किसी भी स्तोत्र या उपाय की पूर्ण सिद्धि के लिए सही विधि व नियमों का पालन करना अत्यंत आवश्यक है:
शुद्धि व पवित्रता (Purity & Preparation)
प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ श्वेत अथवा पीले वस्त्र धारण करें। चित्त को शांत और एकाग्र रखें।
दिशा व आसन (Direction & Seating)
पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। बैठने के लिए कुशा अथवा ऊनी आसन का प्रयोग करें।
दीप प्रज्वलन व आचमन (Lamp & Holy Water)
गाय के शुद्ध घी अथवा तिल के तेल का दीपक प्रज्वलित करें और तांबे के पात्र में स्वच्छ जल रखें।
संकल्प व पाठ (Sankalpa & Mindful Recitation)
हाथ में अक्षत व जल लेकर अपनी मनोकामना का स्मरण करें और स्पष्ट स्वर में लयबद्ध पाठ करें।
समर्पण व क्षमा याचना (Surrender & Gratitude)
पाठ के समापन पर भगवान को प्रणाम करें और अनजाने में हुई किसी त्रुटि के लिए क्षमा मांगें।
क्या आप अपनी कुंडली अनुसार संकल्प व समय जानना चाहते हैं?
आपकी लग्न राशि व वर्तमान महादशा के अनुसार यह पाठ कितने दिनों तक और किस माला से करना चाहिए, ज्योतिषी से सीधे 1-on-1 चैट पर पूछें।
इस पाठ एवं उपाय से संबंधित सामान्य जिज्ञासाएं
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