नवग्रह स्तोत्रम् — महर्षि व्यास रचित नवग्रह स्तुति व विनियोग
महर्षि वेदव्यास रचित संपूर्ण नवग्रह स्तोत्र, जो सूर्य से केतु पर्यंत नवों ग्रहों की पीड़ा को शांत कर सर्वविघ्न का नाश करता है।
डॉ. विनोद पण्डेय
महर्षि वेदव्यास रचित संपूर्ण नवग्रह स्तोत्र, जो सूर्य से केतु पर्यंत नवों ग्रहों की पीड़ा को शांत कर सर्वविघ्न का नाश करता है।

इस लेख में दिए गए उपाय, टोटके, मंत्र व स्तोत्र सार्वभौमिक वैदिक सिद्धांतों पर आधारित हैं। इनका सटीक परिणाम आपकी जन्म कुंडली, ग्रह स्थिति, महादशा व गोचर पर निर्भर करता है। अतः किसी भी उपाय या साधना को व्यक्तिगत रूप से करने से पहले ज्योतिषी से परामर्श अवश्य लें।
नवग्रह स्तोत्रम्
स्रोत एवं पौराणिक संदर्भ: यह परम कल्याणकारी स्तोत्र श्रीमद् ब्रह्माण्ड पुराण से उद्धृत है। इसके रचयिता साक्षात महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास जी हैं। नवग्रहों की अनुकूलता हेतु यह सनातन धर्म का सर्वोपरि स्तोत्र है।
॥ विनियोगः ॥
ॐ अस्य श्रीनवग्रहस्तोत्रमहामन्त्रस्य श्रीव्यास ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीनवग्रहा देवताः, श्रीनवग्रहप्रसादसिद्धयर्थे जपे विनियोगः ॥
॥ अथ नवग्रह ध्यानम् ॥
ब्रह्मामुरारिस्त्रिपुरान्तकारी भानुः शशी भूमिसुतो बुधश्च ।
गुरुश्च शुक्रः शनिराहुकेतवः कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम् ॥
॥ मूल संस्कृत स्तोत्रम् ॥
१. सूर्यः (Sun)
जपाकुसुमसंकाशं काश्यपेयं महाद्युतिम् ।
तमोऽरिं सर्वपापघ्नं प्रणतोऽस्मि दिवाकरम् ॥ १ ॥
२. चन्द्रः (Moon)
दधिशङ्खतुषाराभं क्षीरोदार्णवसम्भवम् ।
नमामि शशिनं सोमं शम्भोर्मुकुटभूषणम् ॥ २ ॥
३. मङ्गलः (Mars)
धरणीगर्भसम्भूतं विद्युत्कान्तिसमप्रभम् ।
कुमारं शक्तिहस्तं च मङ्गलं प्रणमाम्यहम् ॥ ३ ॥
४. बुधः (Mercury)
प्रियङ्गुकलिकाश्यामं रूपेणाप्रतिमं बुधम् ।
सौम्यं सौम्यगुणोपेतं तं बुधं प्रणमाम्यहम् ॥ ४ ॥
५. गुरुः (Jupiter)
देवानां च ऋषीणां च गुरुं काञ्चनसन्निभम् ।
बुद्धिभूतं त्रिलोकेशं तं नमामि बृहस्पतिम् ॥ ५ ॥
६. शुक्रः (Venus)
हिमकुन्दमृणालाभं दैत्यानां परमं गुरुम् ।
सर्वशास्त्रप्रवक्तारं भार्गवं प्रणमाम्यहम् ॥ ६ ॥
७. शनिः (Saturn)
नीलाञ्जनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम् ।
छायामार्तण्डसम्भूतं तं नमामि शनैश्चरम् ॥ ७ ॥
८. राहुः (North Node)
अर्धकायं महावीर्यं चन्द्रादित्यविमर्दनम् ।
सिंहिकागर्भसम्भूतं तं राहुं प्रणमाम्यहम् ॥ ८ ॥
९. केतुः (South Node)
पलाशपुष्पसंकाशं तारकाग्रहमस्तकम् ।
रौद्रं रौद्रात्मकं घोरं तं केतुं प्रणमाम्यहम् ॥ ९ ॥
॥ फलश्रुतिः ॥
इति व्यासमुखोद्गीतं यः पठेत् सुसमाहितः ।
दिवा वा यदि वा रात्रौ विघ्नशान्तिर्भविष्यति ॥ १० ॥
नरनारीनृपाणां च भवेद् दुःस्वप्ननाशनम् ।
ऐश्वर्यमतुलं तेषामारोग्यं पुष्टिवर्धनम् ॥ ११ ॥
ग्रहाणां मेरुसंस्थानां सुहृदां सर्वदेहिनाम् ।
ग्रहपीड़ाप्रशमनं सर्वसिद्धिप्रदायकम् ॥ १२ ॥
॥ इति श्रीमद्व्यासमुखोद्गीतं नवग्रहस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
॥ जप / पाठ समर्पण मन्त्रः ॥
गुह्यातिगुह्यगोप्ता त्वं गृहाणास्मत्कृतं जपम् ।
सिद्धिर्भवतु मे देव त्वत्प्रसादात् सुरेश्वर ॥
कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा बुद्ध्यात्मना वा प्रकृतेः स्वभावात् ।
करोमि यद्यत् सकलं परस्मै नारायणायेति समर्पयामि ॥
॥ ॐ तत्सत् श्रीनवग्रहदेवताप्रीत्यर्थे श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥
॥ पाठ विधि एवं नियम ॥
1. काल एवं दिशा: प्रातः अथवा सायंकाल स्नानोपरांत पूर्व दिशा की ओर मुख करके नवग्रह यंत्र अथवा दीपक के समक्ष बैठें।
2. पाठ संख्या: प्रतिदिन १ अथवा ३ पाठ करें। विशेष ग्रह की महादशा या अंतर्दशा में उस ग्रह के मन्त्र अथवा स्तोत्र का ११ पाठ करना अत्यंत फलदायी है।
3. ज्योतिषीय प्रभाव: यह स्तोत्र जन्मकुंडली के किसी भी भाव में स्थित क्रूर अथवा अशुभ ग्रह के अनिष्ट प्रभाव को शांत कर भाग्य में उन्नति प्रदान करता है।
इस पाठ एवं उपाय से प्राप्त होने वाले व्यावहारिक लाभ
ऋषि-मुनियों द्वारा प्रतिपादित इस अनुष्ठान का नियमित अभ्यास करने से जातक को निम्नलिखित प्रत्यक्ष सकारात्मक परिणामों की अनुभूति होती है:
मानसिक शांति व एकाग्रता
दैनिक चिंता, अज्ञात भय, अनिद्रा व नकारात्मक विचारों का शमन होकर आत्मविश्वास में वृद्धि होती है।
संकट व विघ्न निवारण
लंबे समय से अटके हुए कार्य, कानूनी अड़चनों व व्यावसायिक रुकावटों में दैवीय मार्ग प्रशस्त होता है।
आर्थिक स्थिरता व ऋण मुक्ति
मां महालक्ष्मी व कुबेर देव की कृपा से अनावश्यक धन अपव्यय रुकता है और आय के नए स्रोत बनते हैं।
ग्रह दोष शमन व भाग्योदय
कुंडली के क्रूर ग्रहों (शनि, राहु, मंगल) के अशुभ गोचर का प्रभाव शांत होकर शुभ फलों में वृद्धि होती है।
पाठ एवं पूजन की सरल प्रामाणिक विधि
किसी भी स्तोत्र या उपाय की पूर्ण सिद्धि के लिए सही विधि व नियमों का पालन करना अत्यंत आवश्यक है:
शुद्धि व पवित्रता (Purity & Preparation)
प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ श्वेत अथवा पीले वस्त्र धारण करें। चित्त को शांत और एकाग्र रखें।
दिशा व आसन (Direction & Seating)
पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। बैठने के लिए कुशा अथवा ऊनी आसन का प्रयोग करें।
दीप प्रज्वलन व आचमन (Lamp & Holy Water)
गाय के शुद्ध घी अथवा तिल के तेल का दीपक प्रज्वलित करें और तांबे के पात्र में स्वच्छ जल रखें।
संकल्प व पाठ (Sankalpa & Mindful Recitation)
हाथ में अक्षत व जल लेकर अपनी मनोकामना का स्मरण करें और स्पष्ट स्वर में लयबद्ध पाठ करें।
समर्पण व क्षमा याचना (Surrender & Gratitude)
पाठ के समापन पर भगवान को प्रणाम करें और अनजाने में हुई किसी त्रुटि के लिए क्षमा मांगें।
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आपकी लग्न राशि व वर्तमान महादशा के अनुसार यह पाठ कितने दिनों तक और किस माला से करना चाहिए, ज्योतिषी से सीधे 1-on-1 चैट पर पूछें।
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