श्री शिव चालीसा — महादेव की पावन स्तुति, महिमा व पूजन विधान
भगवान् आशुतोष शिव शम्भू की कृपा वर्षा कराने वाली अत्यंत सुगम और प्रभावशाली ४० चौपाइयों की सिद्ध स्तुति।
डॉ. विनोद पण्डेय
भगवान् आशुतोष शिव शम्भू की कृपा वर्षा कराने वाली अत्यंत सुगम और प्रभावशाली ४० चौपाइयों की सिद्ध स्तुति।

इस लेख में दिए गए उपाय, टोटके, मंत्र व स्तोत्र सार्वभौमिक वैदिक सिद्धांतों पर आधारित हैं। इनका सटीक परिणाम आपकी जन्म कुंडली, ग्रह स्थिति, महादशा व गोचर पर निर्भर करता है। अतः किसी भी उपाय या साधना को व्यक्तिगत रूप से करने से पहले ज्योतिषी से परामर्श अवश्य लें।
श्री शिव चालीसा
स्रोत एवं परंपरा: सनातन शैव परंपरा में भगवान् भोलेनाथ की कृपा प्राप्ति हेतु नित्य पठनीय चालीसा।
॥ दोहा ॥
जय गणेश गिरिजा सुवन मंगल मूल सुजान ।
कहत अयोध्यादास तुम देहु अभय वरदान ॥
॥ चौपाई ॥
जय गिरिजापति दीन दयाला ।
सदा करत सन्तन प्रतिपाला ॥ १ ॥
भाल चन्द्रमा सोहत नीके ।
कानन कुण्डल नागफनी के ॥ २ ॥
अंग गौर शिर गंग बहाये ।
मुण्डमाल तन क्षार लगाये ॥ ३ ॥
वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे ।
छवि को देखि नाग मुनि मोहे ॥ ४ ॥
मैना मातु की ह्वै दुलारी ।
बाम अंग सोहत छवि न्यारी ॥ ५ ॥
कर त्रिशूल सोहत शुचि भालो ।
शत्रु निपातन कूट निहालो ॥ ६ ॥
नन्दि गणेश सोहैं तहँ कैसे ।
सागर मध्य कमल हैं जैसे ॥ ७ ॥
कार्तिक श्याम और गणराऊ ।
या छवि को कहि जात न काऊ ॥ ८ ॥
देवन जबहीं जाय पुकारा ।
तब ही तुम प्रभु आपु सँभारा ॥ ९ ॥
किया उपद्रव तारक भारी ।
देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी ॥ १० ॥
तुरत षडानन आप पठायौ ।
लवनिमेष महँ मारि गिरायौ ॥ ११ ॥
आप जलंधर असुर संहारा ।
सुयश तुम्हार विदित संसारा ॥ १२ ॥
त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई ।
सबहिं कृपा करि लीन बचाई ॥ १३ ॥
किया तपहिं भागीरथ भारी ।
पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी ॥ १४ ॥
दानिन महँ तुम सम कोउ नाहीं ।
सेवक अस्तुति करत सदाहीं ॥ १५ ॥
वेद माहि महिमा तुम गाई ।
अकथ अनादि भेद नहिं पाई ॥ १६ ॥
प्रगट दधीचि के हित भये ।
शत्रु संहारि स्वर्ग पद दये ॥ १७ ॥
रूप विशाल रूप अति भारी ।
देखि विस्मित भये नर नारी ॥ १८ ॥
शरणागत को पार लगावै ।
अमर नाम जग में सो पावै ॥ १९ ॥
शिव चालीसा जो नित गावै ।
सो सब सुख जीवन में पावै ॥ २० ॥
॥ दोहा ॥
नित्त नेम करि प्रातः ही पाठ करै मन लाय ।
धन जन सुख संपत्ति लहै ईश कृपा बहु पाय ॥
॥ इति श्रीशिवचालीसा सम्पूर्णा ॥
॥ जप / पाठ समर्पण मन्त्रः ॥
कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा बुद्ध्यात्मना वा प्रकृतेः स्वभावात् ।
करोमि यद्यत् सकलं परस्मै साम्बसदाशिवाय समर्पयामि ॥
॥ ॐ तत्सत् श्रीसाम्बसदाशिवार्पणमस्तु ॥
इस पाठ एवं उपाय से प्राप्त होने वाले व्यावहारिक लाभ
ऋषि-मुनियों द्वारा प्रतिपादित इस अनुष्ठान का नियमित अभ्यास करने से जातक को निम्नलिखित प्रत्यक्ष सकारात्मक परिणामों की अनुभूति होती है:
मानसिक शांति व एकाग्रता
दैनिक चिंता, अज्ञात भय, अनिद्रा व नकारात्मक विचारों का शमन होकर आत्मविश्वास में वृद्धि होती है।
संकट व विघ्न निवारण
लंबे समय से अटके हुए कार्य, कानूनी अड़चनों व व्यावसायिक रुकावटों में दैवीय मार्ग प्रशस्त होता है।
आर्थिक स्थिरता व ऋण मुक्ति
मां महालक्ष्मी व कुबेर देव की कृपा से अनावश्यक धन अपव्यय रुकता है और आय के नए स्रोत बनते हैं।
ग्रह दोष शमन व भाग्योदय
कुंडली के क्रूर ग्रहों (शनि, राहु, मंगल) के अशुभ गोचर का प्रभाव शांत होकर शुभ फलों में वृद्धि होती है।
पाठ एवं पूजन की सरल प्रामाणिक विधि
किसी भी स्तोत्र या उपाय की पूर्ण सिद्धि के लिए सही विधि व नियमों का पालन करना अत्यंत आवश्यक है:
शुद्धि व पवित्रता (Purity & Preparation)
प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ श्वेत अथवा पीले वस्त्र धारण करें। चित्त को शांत और एकाग्र रखें।
दिशा व आसन (Direction & Seating)
पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। बैठने के लिए कुशा अथवा ऊनी आसन का प्रयोग करें।
दीप प्रज्वलन व आचमन (Lamp & Holy Water)
गाय के शुद्ध घी अथवा तिल के तेल का दीपक प्रज्वलित करें और तांबे के पात्र में स्वच्छ जल रखें।
संकल्प व पाठ (Sankalpa & Mindful Recitation)
हाथ में अक्षत व जल लेकर अपनी मनोकामना का स्मरण करें और स्पष्ट स्वर में लयबद्ध पाठ करें।
समर्पण व क्षमा याचना (Surrender & Gratitude)
पाठ के समापन पर भगवान को प्रणाम करें और अनजाने में हुई किसी त्रुटि के लिए क्षमा मांगें।
क्या आप अपनी कुंडली अनुसार संकल्प व समय जानना चाहते हैं?
आपकी लग्न राशि व वर्तमान महादशा के अनुसार यह पाठ कितने दिनों तक और किस माला से करना चाहिए, ज्योतिषी से सीधे 1-on-1 चैट पर पूछें।
इस पाठ एवं उपाय से संबंधित सामान्य जिज्ञासाएं
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