ऋग्वैदिक श्री सूक्तम् — महालक्ष्मी की अमोघ वैदिक ऋचाएं व अर्थ
ऋग्वेद के खिल भाग का यह परम सिद्ध सूक्त लक्ष्मी तत्व की अधिष्ठात्री महालक्ष्मी को प्रसन्न करने का सर्वोपरि वैदिक साधन है।
डॉ. विनोद पण्डेय
ऋग्वेद के खिल भाग का यह परम सिद्ध सूक्त लक्ष्मी तत्व की अधिष्ठात्री महालक्ष्मी को प्रसन्न करने का सर्वोपरि वैदिक साधन है।

इस लेख में दिए गए उपाय, टोटके, मंत्र व स्तोत्र सार्वभौमिक वैदिक सिद्धांतों पर आधारित हैं। इनका सटीक परिणाम आपकी जन्म कुंडली, ग्रह स्थिति, महादशा व गोचर पर निर्भर करता है। अतः किसी भी उपाय या साधना को व्यक्तिगत रूप से करने से पहले ज्योतिषी से परामर्श अवश्य लें।
ऋग्वैदिक श्री सूक्तम्
स्रोत एवं वैदिक संदर्भ: यह सूक्त ऋग्वेद के खिल सूक्त परिशिष्ट में परिगणित है। इसके ऋषि आनन्द, कर्दम, चिक्लीत और इन्दिरासुत हैं तथा छन्द अनुष्टुप् व त्रिष्टुप् हैं।
॥ विनियोगः ॥
ॐ अस्य श्रीसूक्तमहामन्त्रस्य आनन्द-कर्दम-चिक्लीतेन्दिरासुता ऋषयः, अनुष्टुप्-त्रिष्टुप् छन्दांसि, श्रीर्महालक्ष्मीर्देवता, श्रीमहालक्ष्मीप्रसादसिद्धयर्थे जपे (होमे) विनियोगः ॥
॥ मूल वैदिक ऋचाएं ॥
ॐ हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम् ।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह ॥ १ ॥
तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम् ।
यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामश्वं पुरुषाscreen२ ॥ २ ॥
अश्वपूर्वां रथमध्यां हस्तिनादप्रबोधिनीम् ।
श्रियं देवीमुपह्वये श्रीर्मा देवी जुषताम् ॥ ३ ॥
कां सोस्मितां हिरण्यप्राकारामार्द्रां ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम् ।
पद्मे स्थितां पद्मवर्णां तामिहोपह्वये श्रियम् ॥ ४ ॥
चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं श्रियं लोके देवजुष्टामुदाराम् ।
तां पद्मिनीमीं शरणमहं प्रपद्येऽलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे ॥ ५ ॥
आदित्यवर्णे तपसोऽधिजातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽथ बिल्वः ।
तस्य फलानि तपसानुदन्तु मायान्तरायाश्च बाह्या अलक्ष्मीः ॥ ६ ॥
उपैतु मां देवसखः कीर्तिश्च मणिना सह ।
प्रादुर्भूतो सुराstreऽस्मिन् कीर्तिमृद्धिं ददातु मे ॥ ७ ॥
क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठामलक्ष्मीं नाशयाम्यहम् ।
अभूतिमसमृद्धिं च सर्वान् निर्णुद मे गृहात् ॥ ८ ॥
गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम् ।
ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोपह्वये श्रियम् ॥ ९ ॥
मनसः काममाकूतिं वाचः सत्यमशीमहि ।
पशूनां रूपमन्नस्य मयि श्रीः श्रयतां यशः ॥ १० ॥
कर्दमेन प्रजाभूता मयि सम्भव कर्दम ।
श्रियं वासय मे कुले मातरं पद्ममालिनीम् ॥ ११ ॥
आपः सृजन्तु स्निग्धानि चिक्लीत वस मे गृहे ।
नि च देवीं मातरं श्रियं वासय मे कुले ॥ १२ ॥
आर्द्रां पुष्करिणीं पुष्टिं पिङ्गलां पद्ममालिनीम् ।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह ॥ १३ ॥
आर्द्रां यः करिणीं यष्टिं सुवर्णां हेममालिनीम् ।
सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह ॥ १४ ॥
तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम् ।
यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्योऽश्वान् विन्देयं पुरुषानहम् ॥ १५ ॥
यः शुचिः प्रयतो भूत्वा जुहुयादाज्यमन्वहम् ।
श्रियः पञ्चदशर्चं च श्रीकामः सततं जपेत् ॥ १६ ॥
॥ जप / पाठ समर्पण मन्त्रः ॥
गुह्यातिगुह्यगोप्ता त्वं गृहाणास्मत्कृतं जपम् ।
सिद्धिर्भवतु मे देव त्वत्प्रसादान्महेश्वरि ॥
॥ ॐ तत्सत् श्रीमहालक्ष्मीचरणारविन्दार्पणमस्तु ॥
इस पाठ एवं उपाय से प्राप्त होने वाले व्यावहारिक लाभ
ऋषि-मुनियों द्वारा प्रतिपादित इस अनुष्ठान का नियमित अभ्यास करने से जातक को निम्नलिखित प्रत्यक्ष सकारात्मक परिणामों की अनुभूति होती है:
मानसिक शांति व एकाग्रता
दैनिक चिंता, अज्ञात भय, अनिद्रा व नकारात्मक विचारों का शमन होकर आत्मविश्वास में वृद्धि होती है।
संकट व विघ्न निवारण
लंबे समय से अटके हुए कार्य, कानूनी अड़चनों व व्यावसायिक रुकावटों में दैवीय मार्ग प्रशस्त होता है।
आर्थिक स्थिरता व ऋण मुक्ति
मां महालक्ष्मी व कुबेर देव की कृपा से अनावश्यक धन अपव्यय रुकता है और आय के नए स्रोत बनते हैं।
ग्रह दोष शमन व भाग्योदय
कुंडली के क्रूर ग्रहों (शनि, राहु, मंगल) के अशुभ गोचर का प्रभाव शांत होकर शुभ फलों में वृद्धि होती है।
पाठ एवं पूजन की सरल प्रामाणिक विधि
किसी भी स्तोत्र या उपाय की पूर्ण सिद्धि के लिए सही विधि व नियमों का पालन करना अत्यंत आवश्यक है:
शुद्धि व पवित्रता (Purity & Preparation)
प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ श्वेत अथवा पीले वस्त्र धारण करें। चित्त को शांत और एकाग्र रखें।
दिशा व आसन (Direction & Seating)
पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। बैठने के लिए कुशा अथवा ऊनी आसन का प्रयोग करें।
दीप प्रज्वलन व आचमन (Lamp & Holy Water)
गाय के शुद्ध घी अथवा तिल के तेल का दीपक प्रज्वलित करें और तांबे के पात्र में स्वच्छ जल रखें।
संकल्प व पाठ (Sankalpa & Mindful Recitation)
हाथ में अक्षत व जल लेकर अपनी मनोकामना का स्मरण करें और स्पष्ट स्वर में लयबद्ध पाठ करें।
समर्पण व क्षमा याचना (Surrender & Gratitude)
पाठ के समापन पर भगवान को प्रणाम करें और अनजाने में हुई किसी त्रुटि के लिए क्षमा मांगें।
क्या आप अपनी कुंडली अनुसार संकल्प व समय जानना चाहते हैं?
आपकी लग्न राशि व वर्तमान महादशा के अनुसार यह पाठ कितने दिनों तक और किस माला से करना चाहिए, ज्योतिषी से सीधे 1-on-1 चैट पर पूछें।
इस पाठ एवं उपाय से संबंधित सामान्य जिज्ञासाएं
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